-कोमल साहू
किसी भी देश को स्वच्छ रखने में उस देश के प्रत्येक नागरिक की अहम भूमिका होती है। चाहे वह आजादी की लड़ाई हो या लोगों को किसी भी मुद्दे को लेकर जागरूक करना हो, मीडिया ( प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, पारंपरिक मीडिया, सोशल मीडिया) ने हमेशा सूचना और शिक्षा प्रदान कर लोगों की आवाज को ऊपर उठाने का कार्य किया है। इक्कीसवीं सदी में किसी पत्रकारिता ने क्रांति पैदा की है तो वह नागरिक पत्रकारिता है, नागरिक पत्रकारिता का उदय तब हुआ जब मुख्य धारा की मीडिया ने लोगों को अनदेखा किया और उनकी बातों को अनसुना कर उनकी आवाज दबाने का प्रयास किया। बात स्वच्छता की करें तो इस पत्रकारिता ने लोगों के अंदर ऐसा डर पैदा किया है, जिससे लोग बीच सड़क पर कचरा फैलाने व गंदगी करने से पहले कई बार सोचने पर मजबूर हुए हैं।
बीबीसी हिंदी व अन्य सोशल साइट्स पर प्रकाशित आकड़ो पर नजर डाले तो भारत की सवा अरब जनसंख्या में लगभग 70 करोड़ लोगों के पास फोन है, इसमें से 25 करोड़ लोगों की जेब में स्मार्टफोन है। 15.5 करोड़ लोग हर महीने फेसबुक पर आते हैं और 16 करोड़ लोग हर महीने व्हाट्सएप पर रहते हैं। अब आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि इन सोशल साइट्स का लोगों के जीवन में कितना प्रभाव है। आज भारत के प्रत्येक कोने में स्वच्छ भारत अभियान की लहरें दौड़ रही है। यह मिशन बड़े पैमाने पर एक जनआंदोलन है, जिसका प्रयास 2022 तक भारत को स्वच्छ बनाना है। इस अभियान को सरकार द्वारा देश की स्वच्छता के प्रतीक के रूप में शुरू किया गया है। स्वच्छता केवल एक सोच नहीं है, इस ओर सबसे अधिक जोर देना और व्यापक स्तर पर जनआंदोलन इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि यह मुद्दा लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा है। बदलाव के इस दौर में यदि स्वच्छता के क्षेत्र में हम पीछे रह गए तो आर्थिक उन्नति का कोई महत्व नहीं होगा। हमारे देश में सफाई तो बहुत पहले से प्रारंभ हो चुकी है, आधिकारिक रूप से स्वच्छता अभियान 1999 से चला आ रहा है, लेकिन अब सफाई सुर्खियों में है और यह भी नागरिक पत्रकारिता और सोशल मीडिया की वजह से, महात्मा गांधी जी की 145 वीं जयंती पर 2 अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान ने नयी परिभाषा दे दी है। अब आम नागरिकों के साथ-साथ नामी गिरामी हस्तियां भी सड़को पर सफाई करती दिख रही है। स्वच्छ्ता उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार ने 11 करोड़ 11 लाख शौचालयों के निर्माण के लिए एक लाख करोड़ खर्च करने की योजना बनाई थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार शहरी भारत में हर साल 47 मिलियन टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है। इस अभियान की सफलता में बहुत हद तक सोशल मीडिया और नागरिक पत्रकारिता का योगदान रहा है। कड़ी मेहनत के बाद भी जब जनता की समस्या का समाधान नही होता तो, लोग सोशल मीडिया के माध्यम से अभियान शुरू कर उस कार्य को करने पर मजबूर कर देती है। यह भी देखा जाता है कि जैसा कोई पसंदीदा अभिनेता करता है, वैसा उसके चाहने वाले भी करने लगते हैं, उनको देखकर लोग सोशल मीडिया पर सफाई करते हुए तस्वीर या वीडियो साझा कर रहे हैं। स्वच्छता पर कई फिल्में भी बन रही है, जिसका सोशल मीडिया पर प्रमोशन जोरों पर है। छोटे- छोटे गांवों, कस्बों में लोग अलग-अलग समूह बनाकर स्वच्छता का कार्य कर रहे हैं। लोगों द्वारा लापरवाही से वाहन चलाते हुए बीच सड़क पर कचरा फेंक दिया जाता है, नागरिक पत्रकारिता की वजह से लोग ऐसा करने वालों का तत्काल विडियो या तस्वीर खींचकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देते हैं। लोग सोशल मीडिया पर अपने पर्सनल ब्लॉग, साइट्स पर विभिन्न लेख प्रकाशित कर इससे होने वाले फायदे या नुकसान की जानकारी दे रहे हैं। कुछ स्थानों पर यह भी देखा गया शौचालय बनाने के बाद भी लोग इसका उपयोग नहीं करते हैं और ऐसे लोगों के पास शौचालय उपयोग न करने के अनेक बहाने उपलब्ध हैं, जैसे वह लंबे समय से झाड़ियों के पीछे या खेत खलिहान में शौच करते आ रहे हैं, बंद कमरे के अंदर शौच करने में वे खुद को असहज महसूस करते हैं। यह भी एक समस्या है जो शौचालय निर्माण के बाद भी खुले में शौच को दर्शाता है। नागरिक पत्रकारिता व सोशल मीडिया ने तो यह भी दिखाया है कि कुछ लोग सरकार द्वारा शौचालय निर्माण के बाद उसमें उपयोग न करने वाले सामानों को रखकर ताला लगा देते हैं और वह सालों साल उसी तरह बंद पड़ा रहता है। सोशल मीडिया के माध्यम से एक ओर व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है वहीं दूसरी ओर आम जनता द्वारा ही इसे अनदेखा किया जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 60 फीसदी आबादी शौच के लिए झाड़ियों के पीछे खेतों में या सड़क किनारे जाते हैं, इससे कई समस्याएं उत्पन्न होती है जैसे बच्चों की असमय मौत, संक्रमण और बीमारियों का फैलना और अहम, सुनसान स्थान पर शौच के लिए गई युवतियों का बलात्कार।
प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान को देश और विदेशों में सराहना तो मिली है साथ ही भारत देश में व्यापक स्तर पर जनसमर्थन भी प्राप्त हुआ है। वर्तमान में हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वच्छता के प्रति लोगों की सोच में बदलाव लाना है। सवाल यह है कि हमारे देश में लोग बीच सड़क या अन्य जगहों पर कचरा न फेंककर व्यवस्थित या कूड़ेदान में फेंकना कब सीखेंगे?, अपने घर की तरह अपने इलाके को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी कब लेंगे? ग्रामीण भारत में सफाई की समस्या इतनी भयावह है कि यह सोचकर आश्चर्य लगता है कि जब तक नागरिक स्वयं जिम्मेदारी नहीं लेंगे यह लक्ष्य 2022 तक कैसे पूरा हो पाएगा। भारत को स्वच्छ, समृद्ध और हरियाली युक्त बनाने के लिए भारत के प्रत्येक घर में शौचालय होना और खुले में शौच किए जाने की प्रवृत्ति को बंद किया जाना बहुत जरूरी है, जिसके लिए नागरिक पत्रकारिता एक प्रमुख हथियार है और इसीलिए इसकी भूमिका अहम हो जाती है।

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